( बुद्धि-विरोधी बाबाओं से सावधान रहना और काम करना सभी जागरूक मनुष्य का कर्त्तव्य है। )

बुधवार, 18 मई 2011

जब आये थे बुद्ध

बीत गई कई सहस्राब्दियाँ

जब आये थे बुद्ध ... बताने -सर्वं दुखं दुखं ...

अनुभवों और तपस्याओं से गुजर कर एक राजकुमार

बन गया महात्मा बुद्ध

प्रतीत्यसमुत्पाद की गुत्थी सुलझाते हुए

बताया माध्यम मार्ग जीवन का दो अतियों के बीच से

कृपा की जगह करुणा का पाठ पढाने

सैकड़ों जन्म लेकर वह बोधिसत्त्व

धर्म को

स्वर्ग से उतार कर लाया मनुष्यों की धरती पर

दुरूह वैदिक मन्त्रों से मुक्त करा कर

लोक भाषा में

तत्त्व-कथाओं को बीन-बीन कर निकाला

श्रद्धा की थाली से

दांत के नीचे आने वाले कंकडों की तरह .....


उसी बुद्ध का जन्म दिन है आज

आओ ... शपथ लें कि छोड़ देंगे दुरुहता को

पहुंचेंगे जन-मन तक ....


रविवार, 15 मई 2011

दर्शन और कविता

क्षण और क्षण के बीच भी अंतराल होता है।
उस अंतराल को भी क्षण ही कहना होगा ... और इस तरह अंतराल को खोजते खोजते हम एक तार्किक अनवस्था को प्राप्त होते हैं... और निरुत्तर और अप्रतिभ हो उठते हैं।
इस तार्किक नैराश्य और विवशता के विषण्ण क्षणों में काव्य का उदय होता है .... और संवेग का लास्य इस अंतराल को ढक देता है... हम दार्शनिकता का तिरस्कार कर कवि होने लगते हैं।
कवि होना सहज नहीं , प्रत्युत एक विवशता है।
दर्शन सभ्यता और संस्कृति को ढांचा और आकार देता है ... और कविता तन्यता और चिकनापन देती है।
दर्शन ज्ञान की परम्परा है और कविता ज्ञान का संवेगात्मक विराम।
धर्मवेत्ता लोग ज्ञानमूलक दर्शन से सत्य के स्वरूप को अच्छादित करते हैं ... कवि लोग कविता के माध्यम से सत्य को अनावृत्त करते हैं।
दर्शन और दार्शनिकता ... साधारण जन को भयभीत कर अपना स्थान बनाती है ... कविता और साहित्य ... साधारण जन के रोजमर्रा में अपना स्थान बनाते हैं।
असंबद्ध को संबद्ध करने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ प्रेम में है जो कविता का सनातन अवलंब है...
मैं दार्शनिक हूँ ....
मैं कवि होने का अभिलाषी हूँ ....
मैं क्षण और क्षण के बीच के अंतराल को समझना चाहता हूँ.... कविता बनकर समझाना भी चाहता हूँ।

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

सत्य एवं तथ्य का द्वंद्व

सत्य आदर्श है, जिसे हम चाहते हैं... जिसका मूर्त रूप हम देखना चाहते है, पर वह हमें कभी दीखता नहीं। हमें जब दीखता है... यानि हमारा साक्षात्कार हमेशा तथ्य से होता है। तथ्य क्या है ? तथ्य और कुछ नहीं, बल्कि वास्तविकता है। सत्य हमें प्रिय है और तथ्य हमारी विवशता है। सत्य को नहीं छोड़ते ... प्रेम के कारण और तथ्य हमें नहीं छोड़ता।
इन दोनों में अनवरत एक संघर्ष चलता रहता है... एक द्वंद्व मचा रहता है। इस द्वंद्व का , इस संघर्ष का अधिष्ठान कहाँ होता है... जहाँ ये युद्ध होते हैं ?
वह स्थान है, हमारा मन....
व्यक्ति मन जब अपने आसपास की वास्तविकता से ... अपनी यथार्थ परिस्थितियों से ... असहमत होता है....इसलिए असंतुष्ट होता है तो वह प्रतिक्रिया करता है ... प्रतिक्रिया में वह विद्रोह कर बैठता है। इन प्रतिक्रियाओं में, लेकिन , एक सिसृक्षा अंतर्व्याप्त रहती है। इस कोटि की प्रतिक्रिया सहज प्रतिक्रिया नहीं होती, जैसाकि मच्छर काटने पर व्यक्ति करता है, बल्कि यह एक विशेष प्रकार की सर्जनात्मक प्रतिक्रिया होती है।
इसी सर्जनात्मक प्रतिक्रिया को कला कहते हैं।
कला प्रतिक्रिया है, इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। लेकिन प्रतिक्रियाओं की कतिपय सरणियाँ हैं- सहज और सुनियोजित। सुनियोजित प्रतिक्रिया की भी दो कोटियाँ हैं- सर्जनात्मक और विध्वंसात्मक। विध्वंसात्मक सुनियोजित प्रतिक्रिया ही षड़यंत्र कहलाती है और सर्जनात्मक कला । इन्हें सर्जनात्मक और विध्वंसात्मक होना इस बात पर निर्भर करता है कि इनका उद्देश्य क्या है ?
किन्तु सुनियोजित प्रतिक्रयाएं... हमारे आस-पास की वास्तविकता और हमारे अन्दर के मूल्य बोध के परस्पर द्वंद्व से उत्पन्न होती हैं...और ये प्रतिक्रियाएं अनिवार्य हैं, इन्हें रोका भी नहीं जा सकता।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

उपनिषद साहित्य

१. उपनिषद-साहित्य भारतीय मनीषा का दार्शनिक प्रस्थान बिंदु है जो कि परवर्ती भारतीय दार्शनिक चिंतन की दिशाओं को नियमित एवं निर्देशित करता रहा है|

२. दार्शनिक जगत की प्राथमिक समस्या मौलिक एवं आधारभूत तत्त्व का अन्वेषण तथा विश्लेषण है कि किस कारण से चराचर जगत-जीव-अजीव आदि विषयक सृष्टि संभव हो पाती है|

३. यह मानवीय चिंता और आकांक्षा का स्वभाव है कि वह हर स्थिति के मूल की खोज का प्रयास करती है|

४. किन्तु व्यवस्थित शास्त्र के पूर्ण विकसित न हो सकने की दशा में एक तरह की अस्पष्टता का बना रहना भी स्वाभाविक सा ही प्रतीत होता है|

५. यद्यपि, विशेष रूप से, उपनिषदों में तत्त्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा, नीतिमीमांसा, ईशमीमांसा आदि सभी एकान्वित ही प्रतीत होती हैं तथापि इनकी सभी शाखाएं मूलतत्त्व के अन्वेषण अर्थात तत्त्वमीमांसा को ही आश्रय करके ही अवस्थित हैं|

६. एक से अनेक और अनेक से एक के संबंधों की सतर्क एवं बुद्धिसंगत व्याख्या जैसी उपनिषदों में प्राप्त होती है, अन्यत्र प्रायः अप्राप्य है|

७. आधुनिक समालोचकों और इतिहासवादियों को, संभवतः, उपनिषद दुरूह, कल्पित, रहस्यात्मक प्रतीत होती हों किन्तु अध्येताओं को यदि समुचित सिरा मिल जाता है तो उपनिषद सरल और सुबोध विचार-मीमांसा की तरह हमारे सम्मुख अवतरित होती है|

८. उपनिषद अपने वैचारिक दृष्टिकोण के लिए वैदिक पवित्रता का अनिवार्य रूप से सहारा नहीं लेती|

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

कर्म-फल और ईश्वर

संसार के सृजन में ब्रह्म को अधिष्ठान बनाकर अविद्यात्मक माया ही क्रियाशील रहती है। समझने की बात यह है कि यह जगत माया के कारण है, अविद्या के कारण है। कोई सांसारिक व्यक्ति इसीलिए सांसारिक है क्योंकि वह अविद्याग्रस्त है। यदि वह शुद्ध ज्ञानात्मक होता तो उसे सांसारिक होने की किसी भी तरह की आवश्यकता ही न होती। किन्तु प्रदत्त स्थितियां ये हैं कि व्यक्ति (जीव) सांसारिक है। सांसारिक होना किसी की स्वेच्छा नहीं, नैसर्गिक अनिवार्यता है। परिभाषा रूप से हम समझ सकते है कि व्यक्ति अपनी ही अज्ञानात्मक का उत्पाद है।
दूसरी ओर, ईश्वर, जिसे तकनीकी रूप से सगुण ब्रह्म समझ सकते हैं, भी उसी अविद्यामूलक माया की ही सृष्टि है। सत्त्वगुण की प्रधानता के कारण वे कर्म-परिणाम की अनंत श्रृंखला से मुक्त होते हैं।
संसार उपासना, भक्ति, पूजा आदि का प्रचलन देखा जाता है। सांसारिक पूजा सांसारिक कामनाओं के लिए की जाती है। इस तरह की पूजा में पूजा करने वाला भगवान से, ईश्वर से यह अपेक्षा रखता है कि वे उसके लिए उस स्थिति को सुलभ करवा दें जो उसके प्रयासों से नहीं हो पा रहा है। इस काम के पूजक कुछ विनती करता है, कुछ सेवा करने का अभिनय करता है और ईश्वर की प्रतिष्ठित मूर्ति, चित्र अथवा अन्य प्रतीक समक्ष कुछ भौतिक पदार्थ भी रखता है। और अकिंचन होने का दंभ भी भरता है ताकि ईश्वर उसकी अभिलाषा पूरी कर दें और वह सांसारिक रूप से अधिक सबल, अधिक सक्षम हो जाये।
किन्तु बंधुओ, ईश्वर या तो नासमझ है अथवा सबकुछ समझने बूझने वाला। क्या पूजा करने वाला यह नहीं सोचता कि यदि ईश्वर सबकुछ देख समझ रहा है तो अगरबत्ती की सुगंधि, चंद फूल और मुट्ठी भर मिठाई आगे रखकर उससे वैसा काम करवा लेंगे जो संभव नहीं है ? यह बिलकुल असंभव है। ईश्वर कोई रिश्वतखोर अफसर नहीं, जो लिफाफा पकड़ कर काम करदे। वह भी नैसर्गिक नियमों से उतना ही बंधा है जितना कि एक व्यक्ति। संसार में किये गए प्रत्येक कर्म अपने निश्चित और अनिवार्य परिणाम उत्पन्न करते ही हैं। कर्म का फल ईश्वर नहीं कर्म स्वयं ही निश्चित करता है। बस, इतना है कि ईश्वर की अध्यक्षता में कोई घोटाला नहीं है। इस बात में कोई शक नहीं कि लोग-बाग ईश्वरीय न्याय से बहुध असंतुष्ट रहते हैं। और इस बात में भी कोई शक नहीं कि ऐसे लोग स्वयं से, आस-पास के लोगों से , सबसे असंतुष्ट रहते हैं। मूलतः धूर्त और चालाक लोग ईश्वर से अपना काम फटाफट निकलवाना चाहते हैं। यह संभव नहीं है। और अंत में, ईश्वर से अकारण दया और कृपा की अपेक्षा करना भी असंगत है। ईश्वर सबका है, सबके लिए है। इसका तात्पर्य यह है कि जो संसार में रमे हुए हैं उनका शरण संसार है और जो संसार से दुखी और पीड़ित है, ईश्वर उसके लिए हैं।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

काल [समय] के विषय में

१ काल जीवन की पूर्व-स्थिति है।
२ सत्ता कालातीत है, किन्तु उसका अनुभव काल- सापेक्ष है।
३ जीवन शुद्ध सत्ता नहीं है।
४ जीवन में सत्ता अनिवार्यतः एक असत्ता पर आभासित [प्रतीयमान] होती है।
५ इसीलिए जीवन की समाप्ति की बात की जाती है।
६ जीवन ज्ञानात्मक होने से सत्तात्मक प्रतीत होता है किन्तु समाप्त हो जाने से असत्तात्मक सिद्ध होता है।
७ काल वस्तुतः शुद्ध सत्ता का निषेधक है।
८ जो काल [और देश] में संबोध्य है वह अनिवार्यतः नाशवान है।
९ काल [समय] कोई वास्तु नहीं, एक चैतसिक पूर्वग्रह है जो अज्ञानमूलक अभ्यास का चेतन परिणाम है जो व्यक्ति के अहम्बोध पर हावी हो जाता है।
१० अहम्बोध का तात्पर्य है- स्वयं के ज्ञानवान होने का बोध।
११ अहंकार के नाश होने के साथ ही कालबोध[ समय की अनुभूति] भी तिरोहित हो जाता है।
१२ सत्ता से साक्षात्कार अहंकार का तिरोभाव है।
१३ काल और अहंकार से ही जीवन परिचालित होता है।
निष्कर्ष: जीवन को समझने के लिए अपने अहम्बोध और कालबोध को सम्यक रूप से समझें।

रविवार, 30 जनवरी 2011

प्रेम क्या है what is love

संत कबीर ने कहा था,
" प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचे,सीस देहि लै जाय।। "
संत की बानी हमने सुनी, हमने पढ़ी, एक बार नहीं हजारों बार, बार-बार । पर हमने समझा क्या? क्या जाना ? प्रेम के लिए 'सीस' देना पड़ता है।
विद्वानों ने , पंडितों ने इस दोहे की व्याख्या की कि यह सांसारिक प्रेम के विषय में नहीं कहा जा रहा बल्कि यह तो ईश्वरीय प्रेम के विषय में है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए आत्म-समर्पण करना अनिवार्य है। चलो, हमने विद्वान् पंडितों की बात मान ली। लेकिन वे पंडित मुझे यह समझावें कि बिना सांसारिक प्रेम का हार्दिक अनुभव किए बिना हम ईश्वरीय प्रेम के प्रति क्यों लालायित होंगे ?
कोई भी सांसारिक प्रेम का माधुर्य जानकर ही कि प्रेम इतना मधुर होता है, ईश्वरीय प्रेम के लिए उत्कंठित हो पाता है। इसके आलावा, अपन तो ये मानते हैं कि प्रेम प्रेम होता है। प्रेम में मानवीय और ईश्वरीय का कोई भेद ही नहीं होता है। दोनों के माधुर्य में कोई अंतर नहीं होता है। प्रेम की कोई भी स्थिति हो, प्रेम होगा तो प्रेम-पात्र का अंतःकरण गीला हो ही जाएगा, पसीज ही जाएगा।
अपनी समझ तो कहती है कि प्रेम वह अनुभूति है जिसमें प्रेम पात्र अंतरतम पसीज जाये, हृदय उदात्त हो उठे और अन्तःकरण की सारी सीमाएं टूट जाए।
जैसे बरसात में नदी-नाले अपना संकुचित मर्यादित रूप को छोड़कर उदात्त और उदार हो जाते है, वैसे प्रेम में पगा हुआ मनुष्य अपनी संकुचित मर्यादाओं को अतिक्रांत कर चुकता है। हाय रे प्रेम!
जो प्रेम में बावला न हुआ उसने प्रेम क्या किया !
प्रेम रस में भींग जाने पर भी अगर किसी को होश है कि वह कौन है तो शर्तिया वह खुद को छल रहा है, भरमा रहा है। जो अपना अहंकार है, आत्माभिमान है, कुल खानदान जाति गोत्र व्यवसाय हैसियत का अभिमान है , इसी को त्यागना ही सीस देना है।
अपनी सुध-बुध बनी रही, तो काहे का प्रेम, कैसा प्रेम !
अंत में तो यही कहेंगे-
प्रेम मुक्त करता है बांधता नहीं, अपनी मुक्ति का द्वार अपनाओ, खुद को प्रेम में सराबोर कर लो ... प्रेम ही मुक्ति द्वार है प्रेम बांधता नहीं , मुक्त करता है।

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

अहंकार बोले तो घमंड

घमंड क्या है ?
यह एक मनोदशा है। मानसिक स्थिति है जो एक भावात्मक वैचारिक आधार लेकर टिकी रहती है। जब-जब यह मानसिक स्थिति मनुष्य पर प्रभावी होती है उस-उस समय वह अपने अत्यधिक शक्तिशाली समझता है।
घमंड अहंकार , दंभ , अहम्मन्यता , दर्प आदि सभी समानार्थी पद है। यह स्वाभिमान, गर्व , गौरव, या अभिमान आदि पद से तात्त्विक रूप से भिन्न है।
अपनी स्थिति का समुचित भान होना अभिमान है। स्वयं का बोध व्यावहारिक जीवन के आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। यह कुछ कुछ आत्मविश्वास जैसा होता है। आत्मविश्वास और अभिमान में फर्क बस इतना है कि आत्मविश्वास स्वमुखापेक्षी है और अभिमान पर-मुखापेक्षी। गहरी नींद में और आनंदातिरेक के क्षणों में हम अपने अभिमान को भी विस्मृत कर बैठते हैं। सघन प्यार के क्षणों में किया जाने वाला अर्थ हीन कल्लोल इसी भाव का द्योतक है कि हम उन क्षणों में अपना वजूद तक भुला बैठे हैं।
लेकिन घमंड या अहंकार इसके एकदम उल्टा है। अपने श्रेष्ठ और शक्ति शाली समझना इसका एक पहलू है तो प्रतिपक्ष या सामने वाले तुच्छ और कमजोर समझना दूसरा पहलू। अपने आपको समझदार, समर्थ अथवा शक्तिशाली समझने का हक़ सबको है। लेकिन जो सामने वाले को कमजोर , नाकारा या बेवकूफ समझता है, वह अहंकारी या घमंडी हो जाता है।
संसार हो या वैराग्य - अहंकार को कभी अच्छा नतीजा देने वाला नहीं माना जा सकता क्योंकि अहंकार का मारा मनुष्य कभी भी सामने वाले का सही मूल्याङ्कन कर ही नहीं पाता और अंततः वह न उबर पाने वाली हार की चपेट में आ जाता है। अहंकार सचमुच सबसे बड़ा शत्रु है। अपने विनाश से बचने के लिए सिर्फ हमें अपने घमंड या अहंकार से बचना चाहिए। अहंकार का छोड़ना बुजदिली नहीं, स्वाभिमान को छोड़ना कायरता है। अहंकार और स्वाभिमान में फर्क करें और अपने जीवन में हुए परिवर्तन का सुखद अहसास करें और हमें जरूर बताएं।
संत कबीर की सहज वाणी को याद करें-
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करे , आपहु को सुख होय।।

बुधवार, 2 जून 2010

पुनर्जन्म में विश्वास है ?

मैं उन सब से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ जो जाति पर आधारित जनगणना का विरोध कर रहे हैं। प्रश्न है -
क्या आप को पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास है ?
और इस प्रश्न का उत्तर देने की जरुरत नहीं है क्योंकि मैं आप का जबाव जानता हूँ। नाराज न हों, आपका जबाव यही होगा न, कि नहीं, हम कर्म-पुनर्जन्म के खोखले और अवैज्ञानिक बकवास पर कतई विश्वास रखना तो दूर की बात है, हम तो इन अंध विश्वास पर बात करना भी पसंद नहीं करेंगे।
तो आपको जाति प्रथा में भी यकीन न होगा ?
नहीं, नहीं, कभी नहीं।
लेकिन जाति भारतीय समाज की सच्चाई है, जिसकी वज़ह से कुछ लोग मलाई चाट रहे हैं और कुछ लोग मैला ढोते-ढोते बीमार होकर मर जाते है। आप इसके एवज़ में क्या करते हैं?
हम कर भी क्या सकते हैं - निंदा करते है, लेख लिखते है, इसका विरोध करने के लिए लोगों को उकसाते हैं....
आप यह सब कुछ जाति को स्पष्ट हो जाने पर और आराम से कर सकेंगे। लेकिन आप अगर डर रहे है कि उन कथित अवर्णों की संख्या कहीं बहुत अधिक होगी और वे लोकतंत्र में अपने हिस्से की मांग तो नहीं बाधा देंगे !
नहीं... नहीं....आप लोग इतने कायर और डरपोक नहीं है।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

शंकराचार्य के दर्शन के विषय में

आचार्य शंकर भारतीय दार्शनिक जगत के सबसे अधिक लोकप्रिय और संभवतः प्रतिनिधि चिन्तक हैं। उनके इस श्लोकंश, " ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" से दार्शनिक जगत का नौसिखुआ भी अवगत है और इसी अतिलोकप्रियता के कारण उनका चिन्तनात्मक अभिप्राय बहुधा एक सरल किम्वदंती के रूप में अनुदित होने लगा। इस तरह का अनुवाद एक ओर तो उनकी लोकप्रियता को द्योतित करता है किन्तु दूसरी ओर उनके गंभीर दार्शनिक प्रसंगों को सरलीकृत कर उसे हास्यास्पद बनाता है। विगत दो शताब्दियों में गंभीर और प्रतिभाशाली आलोचकों और प्रत्यालोचकों ने इस कृत्य को बड़े मनोयोग से किया है। यह या तो अनुदार मनोवृत्ति का कार्य है अथवा भयमिश्रित चेतना की प्रतिक्रिया। यद्यपि इसके भी कारण हैं। पहला, संस्कृत भाषा, जिसे प्रगतिशीलता और आधुनिकता का सर्वथा प्रतिगामिनी मानी गई तो दूसरा कारण यह रहा कि भारत आधुनिक समाज की निकटवर्ती परिधि से बाहर अवस्थित रहा। तथापि अब भू -मंडली- करण के इस दौर में उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में इन कारणों की पकड़ शिथिल पड़ गई सी प्रतीत हो रही है। अतएव, धर्म-मीमांसक और तत्त्व-मीमांसक के रूप में स्थापित आचार्य शंकर को समाज-मीमांसक के रूप में प्रस्तावित करता हुआ इसी लेखक का प्रयास है - शंकराचार्य का समाजदर्शन, विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली से प्रकाशित है। आपकी कृपा दृष्टि इस पुस्तक पर पड़ेगी तो इस अकिंचन का श्रम अवश्य सार्थक होगा।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

झूठ क्या होता है ?

बड़ा ही पुराना प्रसंग है - सच और झूठ का ।
क्या होता है सच ? हमें पता है ? फिर भी हम दावा करते है कि जी, हम सच जानते हैं। और हमारे इसी दावे से दुनियादारी का कारोबार बेखटके चल रहा है। इसी दावे से हम अपनी जिंदगी शुरू करते हैं और इसीके सहारे जीते-जीते एक दिन हम परम धाम की ओर चल पड़ते हैं। हमारा सच या तो यहीं रह जाता है या फिर कहीं खो जाता है। और जब मैं ही न रहा तो उस सच की कौन खोज करता है। जय रामजी की।
सच क्या था ?
हमने कभी विचार नहीं किया , बस मान लिया क्योंकि मेरे आने से पहले सब उसको सच मानते थे और हमारा क्या जाता था , सो हमने भी उन सभी लोगों के साथ शुरू हो गए और चलते गए, बहते गए, बहते गए बहुत दूर तक ।
ये हुआ सच। सच सबके साथ का सच। काम चलाना था इसलिए मेरा भी सच। सच के व्यावहारिक उपयोग के लिए यह जरुरी है कि इसकी सामाजिक स्वीकृति हो, सार्वजानिक स्वीकार हो। अन्यथा यह अनर्गल प्रलाप कहलाता है।
और हम प्रलाप नहीं करना चाहते, हम अपने भावों को संप्रेषित करना चाहते हैं।
लेकिन झूठ ?
झूठ का कोई चेहरा पहचानते हैं आप ?
यह झूठ क्या होता है ? आप जिसे सच नहीं मानते , वह झूठ होता है, है न !
' इसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा है, लगता है यह झूठ बोल रहा है। '
हम अक्सर दूसरों के झूठ के लिए चिंतित रहते हैं। लेकिन दूसरों से मुझे क्या मतलब ?
मतलब है ।
मतलब होना नहीं चाहिए था पर होता है। क्यों? क्योंकि हम परमुखापेक्षी हैं। परमुखापेक्षी होने का अर्थ है- हम अपने को दूसरों की नजरों में बनाना चाहते है। हम अपना वजूद ही तब मानते है जब दूसरा स्वीकार करे।
आइए, विचार करें कि झूठ क्या होता है?
जब हम अपने वजूद, अपनी उपस्थिति, अपना अस्तित्व को स्वीकार करवाने की धुन में अपने भी हृदय के विरुद्ध जब कुछ बोलते हैं अथवा कोई कार्य-कलाप करते हैं, वही झूठ होता है।
झूठ असत्य और मिथ्या से अलग होता है। अलग इस अर्थ में होता है कि एक मनुष्य , सजग और समझदार मनुष्य असत्य और मिथ्या पर विश्वास करता है और प्रायः तनिक संदेह भी नहीं करता किन्तु झूठ पर वह विश्वास नहीं कर पाता। असत्य और मिथ्या धारणा, समझ और विश्वास से समबद्ध होते हैं किन्तु झूठ व्यक्ति से सीधा जुड़ा होता है।
जिस बात को बोलना या जिस काम को करना हमें ही गलत और अनुचित लगे , वह झूठ है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

चित्त क्यों व्यथित होता है !

कभी न कभी , किसी न किसी वज़ह से सबका चित्त व्यथित होता है। लेकिन क्यों होता है ? इस पर विचार किया। विद्वानों का तो कहना है कि सुख और दुःख तो मन के विकल्प हैं। इनकी स्थिति वास्तविक नहीं होती। विद्वान् चाहे जो कहें किन्तु इस अवास्तविक स्थिति से ही हमारा सम्पूर्ण व्यवहार नियंत्रित होता है। हम भरसक प्रयत्न करते रहते हैं कि हमारे चित्त में , ह्रदय में , मन में सुख का स्थायी वास हो और दुःख कभी न आये।
किन्तु हमारे लाख चाहने और कोशिश करने से भी ऐसा नहीं हो पाता। हमारे चित्त में सुख का वास अपेक्षाकृत क्षणिक होता है और दुःख का वास अपेक्षाकृत अधिक स्थायी। तटस्थ मन तो कभी हो ही नहीं पाता। मन की तटस्थता तो मोक्ष है, महा शांति है, निर्वाण है , परम समत्व है, जो विरला ही अर्जित कर पाता है।
संसार में , सांसारिक जीवन में परम शांति चाहिए भी नहीं। अगर परम शांति मिल जाए तो संसार ही निस्सार हो जाए। बल्कि सांसारिकता ही नष्ट हो जाए। हम संसार में शांति नहीं चाहते प्रत्युत विजय चाहते हैं। हम हमेशा द्वंद्व में लगे रहते हैं। इसी द्वंद्व में हम जीत चाहते हैं।
यह द्वंद्व हर बार बाहरी नहीं होता, कभी-कभी आतंरिक भी होता है। और मज़े की बात यह है कि आन्तरिक द्वंद्व बाहर के द्वंद्व से अधिक क्लिष्ट होता। बाहरी द्वंद्व में हम किसी दूसरे व्यक्ति से भिड़ते हैं और जीत के प्रयास करते हैं। इस प्रयास में हम किसी अन्य व्यक्ति को भी सम्मिलित कर लेते है। इसके लिए कई बार पार्टी बन जाती है , समूह बन जाता है फलतः इस तरह के द्वंद्व की हार जीत का मसला व्यक्तिगत नहीं रह जाता, सामूहिक या सामाजिक हो जाता है।
किन्तु जब द्वंद्व आन्तरिक होता है तो स्थिति पूरी तरह से भिन्न होती है। इस द्वंद्व में व्यक्ति स्वयं ही स्वयं के विरुद्ध होता है अर्थात द्वंद्व के इस सिरे पर भी खुद खड़ा होता है और दूसरे सिरे पर भी खुद वही। यह स्थिति हम सबके जीवन में बार-बार आता है। यह बात सुनने में अटपटी सी लग रही हो कि भला कोई खुद ही खुद के खिलाफ कैसे हो सकता है! लेकिन ऐसा होता है।
और इस तरह के आन्तरिक द्वंद्व में जीत किसी की हो - हार आपकी निश्चित होती है। इसे आन्तरिक धर्म-संकट की तरह समझ सकते है। इसकी जीत में भी हार है। हमें जीत की ख़ुशी नहीं हो पाती, हार का गम बेशक होता है।
गीता, श्रीमद्भागवद्गीता कहती है ," सुखदुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ " । कैसे होगा कि कोई सुख और दुःख को , लाभ और हानि को तथा जीत और हार को बराबर समझे ?
और जब नहीं समझेंगे तो चित्त व्यथित होगा। जब जब आपकी आकांक्षा पूरी नहीं होगी- चित्त व्यथित होगा।
विकल्प हमारे पास दो हैं -१) या तो इच्छा - अभिलाषा से स्वयं को दूर रखें; २)या व्यथित चित्त के साथ जीने का अभ्यास करे।
" मन रे ! तू काहे न धीर धरे " का कोई सही और ठोस जबाव इस संसार में नहीं है, नहीं है।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

आतम ज्ञान बिना सब सुना

क्या आप अपने ही टेलीफोन नंबर से अपने ही नंबर पर फोन कर सकते है ? नहीं, शायद आपका जवाब यही होगा।
और सही जवाब है। हम कितनी भी तरक्की कर लेते हैं तो भी अपने आपसे घनिष्ठ होना नहीं सिख पाते। वैसे सांसारिक जीवन में अपने-आप से काम ही क्या है ? जो कुछ भी करते हैं, यह सोचते हुए करते हैं कि लोग क्या कहते हैं- अच्छा या बुरा ? हर काम को , उसके गुण-दोष को, उसकी खूबी-खराबी को , उसके औचित्य-अनौचित्य को अन्य लोग निर्धारित करते हैं। और हम दूसरो का मुंह जोहते रहते हैं कि किसी तरह वे हमारे काम को अच्छा कहें , उसका अनुमोदन करें। ये जो बेईमानी , भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार, रिश्वतखोरी वगैरह कुकृत्य हैं, आप क्या सोचते है- लोग इनका अनुमोदन नहीं करते ? खूब करते हैं। मेरा दावा है , इसका अनुमोदन आज बंद होगा कल से ये सारे कुकर्म अपने आप होने बंद हो जाएँगे। लेकिन ऐसा नहीं होगा , यह भी सच है।

सारे कर्म= सुकर्म या कुकर्म, सीखे जाते हैं ।

एक छोटा सा , नन्हा सा बच्छ है। हम उसे गणेशजी, शिवजी, हनुमानजी, कृष्ण जी , देवीमाता, आदि किसी की तस्वीर को देखकर कहते है, प्रणाम करो। वह करने लग जाता है। हम सोचते है कि हमने उसे एक सद्गुण सिखाया। उसे छुपना-छिपाना , झूठ बोलना वगैरह सिखाते है । उसे इसके फायदे भी बताते हैं । ये सब करते हुए हमें एकबार भी नहीं लगता कि हम कुकर्म कर रहे हैं ? क्यों? इसलिए कि संसार का यही दस्तूर है। हमने भी इसी तरह सीखा है। जैसे, ये पिता हैं, ये बुआ है, ये दादाजी हैं, ये अपने चाचाजी हैं और ये पड़ोस वाले अंकलजी। हमने भी ऐसे ही सीखा और अपने बच्चे को भी वैसे ही सीखा दिया । इसमें ग़लत क्या है ? कुछ नहीं , कुछ भी नहीं ।
लेकिन ये सीखना नहीं है । यह है है मान लेना। यह ज्ञान नहीं है, यह विश्वास है।
विश्वास की जड़ें गहरी होती जाती हैं , मनुष्य अधिक से अधिक सांसारिक होता जाता है। और उसी क्रम में अपने आप से दूर। और दूसरो की आंखों से देखना, दूसरो के कानों से सुनना , दूसरोकी समझ से समझना.......... यानि जिंदगी पूरी तरह से परमुखापेक्षी हो जाती है। अपनी समझ अपनी नहीं रह जाती हमारे सुख-दुःख जैसे भाव भी हमारी ख़ुद की मर्जी की नहीं रह जाती ।
ऐसे में आत्मा का क्या होता होगा ? यही बिन्दु विचारणीय है ।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

चेतना के दो रूप

चेतना के दो रूप होते हैं-
१) विशुद्ध चेतना और
२) प्रकार्यात्मक चेतना ।
हम चेतन कार्यों में जिस चेतना से रूबरू होते है, वह है प्रकार्यात्मक चेतना यानि फंक्शनल कांशसनेस । चेतना का यह रूप प्रक्रियाशील रहता है इसलिए इसमे परिवर्तन की सम्भावना हमेशा रहती है। हम यह भी कह सकते हैं कि यह पल-पल परिवर्तित होता भी रहता है ।
शुद्ध प्रत्ययवादी दार्शनिक आदि शंकराचार्य और शुद्ध भौतिकवादी चिन्तक कार्ल मार्क्स , आश्चर्यजनक रूप से इस मसले पर एक-मत हैं।
और जो विशुद्ध चेतना है उसके विषय में शंकराचार्य कुछ भी स्पष्ट कहने से बचते है तो मार्क्स इसे तत्त्वमीमांसा का मुद्दा बता कर इससे बचने का मशविरा करते हैं।
फ़िर यह विशुद्ध चेतना है क्या बला? तो मैं आपको समझाता हूँ-
हमारी चेतन अवस्था की तीन उप-अवस्थाएँ हैं -१) जाग्रत , २) स्वप्न अर्थात अर्ध निद्रा तथा ३) सुषुप्ति ।
जाग्रत अवस्था अर्थात जगी हुई स्थिति में प्रक्रियाशील चेतना अपने मुखर स्वरूप में क्रियाशील रहती है। स्वप्न में यही चेतना अपने अवचेतन को अग्रसर कर देती है। इस अवस्था में स्वप्न द्रष्टा पूर्वोक्त चेतना द्वारा जुटायी सामग्री का पुनः उपभोग करता है, जैसे घास खाने वाले पशु पागुर करते हुए कए हुए को फिर खाकर आनंद पाता है। अब सुषुप्ति में , जब सारी इन्द्रियां शिथिल होकर अपने-अपने कर्तव्य से विरत हो चुकी होती है यानि कान सुन नहीं सकता हो, नाक सूंघ नहीं सकती हो, आँखे देख नहीं सकती हो , त्वचा स्पर्श-ज्ञान नहीं ले सकती हो , जीभ स्वाद का रस नहीं ले पाता हो और मन संकल्प-विकल्प अर्थात किसी भी प्रकार की सोच-विचार में असमर्थ हो । इस स्थिति को आश्वास - मरण की तरह भी समझा जा सकता है - यही है सुषुप्ति की अवस्था ।
इस सुषुप्ति की अवस्था में चेतना तो बनी रहती है । या नहीं? किंतु चेतन व्यवहार का पूर्णतया अभाव रहता है। चेतना की यह अवस्था ही विशुद्ध चेतना है।
यहाँ , इस अवस्था में चेतना चेतना को देखती है किसी और को नहीं ।
जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ , इस अवस्था के विषय में विमर्श करने से चिन्तक-दार्शनिक हमेशा से बचते रहे हैं क्योंकि इस स्थिति को सत्यापित या मिथ्यापित किया जाना लगभग असंभव है - यह आत्मसाक्षात्कार का मामला है(जिसमें वैज्ञानिक समझ वाले लोगों की रूचि नहीं भी हो सकती है) ।
छान्दोग्य उपनिषद कहती है, प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक दिन ब्रह्म-लोक की यात्रा करता है (किंतु कोई विरला ही ब्रह्म का शुद्ध चेतना का अहसास कर पाता है)।
यही हैं चेतना के दो रूप।
अतिरिक्त जिज्ञासा , प्रश्न अथवा विवाद के लिए अवश्य लिखें।
विनीत,
डॉ रवीन्द्र कुमार दास

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

प्रकृति और पुरूष

प्रकृति और पुरूष ।
सांख्य दर्शन की व्याख्या है कि मूल तत्त्व के दो रूप हैं - प्रकृति और पुरूष। पुरूष अर्थात चेतन तत्त्व । चेतना कैसी? निरपेक्ष, उदासीन , निष्क्रिय - सिर्फ़ देखता रहने वाला साक्षी = प्रतिक्रिया विहीन साक्षी ।
किंतु प्रकृति अचेतन है, जड़ है तो भी सक्रिय है । यह सक्रियता कैसी है ? एक अचेतन तत्त्व में सक्रियता कैसे आ सकती है ? यह सक्रियता आती है पुरूष के साहचर्य से , सहवास से। पुरूष का संसर्ग मात्र पाकर प्रकृति चंचल हो उठती है, सक्रिय हो उठती है, जैसे प्रिय के आगमन से कामिनियाँ चंचला हो जाती हैं ।
सांख्य दर्शन का यह रूपक पुरूष वर्चस्व वादी है - यह अच्छा नहीं है किंतु है।
ध्यान देने की बात है कि प्रकृति सब कुछ करती है, यही सब कुछ करती है किंतु उसके कुछ भी करने के लिए पुरूष का सान्निध्य अनिवार्य है। अकेली प्रकृति कुछ नहीं कर सकती । पुरूष वाद ने अपना खेल कर लिया । बच्चा जानेगी स्त्री और वंश चलेगा पुरूष का !
पुरूष निर्लिप्त है , पुरूष को किसी भी तरह की लिप्सा नहीं है । उसे प्रकृति ही भोग के संसार में ले जाती है - ऐसा सांख्य दर्शन मानता है।
सांख्य दर्शन और भी बहुत कुछ कहता है। अपनी धारणा को बनाए रखने के लिए बहुत सारे प्रपंच रचता है।
पुरूष और प्रकृति ।
संसार के दो स्तम्भ है - सुनने में अच्छा लगता है किंतु व्याख्या जब आगे बढती है तो इसमे विद्रूपता और भयानक होकर सामने आती जाती है ।
पारस्परिकता के नाम पर सांख्य दर्शन पक्षपात की राजनीति करता है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

ईश्वर मर गया !

बहुत साल हुए, बल्कि शताब्दी गुजर गई - किसी अर्ध-विक्षिप्त दार्शनिक नीत्से ने कहा था कि ईश्वर मर गया।
हम ठहरे ईश्वरवादी पुतले , सो हमने महत्त्व न दिया।
सवाल है कि ईश्वर था कहाँ ?
मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, या गिरजों में ?
या हमारे आपके मन में, ह्रदय में ?
मैं यह दावे से नहीं कह सकता कि ईश्वर है या था ?
पर मैं यह निश्चय पूर्वक कहना चाहता हूँ कि ईश्वर का डर था ?
इसी डर से ईश्वर का शासन, प्रशासन कायम था।
फिर लोगों ने ईश्वर का डर दिखा कर अपना उल्लू सीधा करना शुरू किया ।
भोले-भले लोग डरे भी।
फिर वे भोले-भले लोगों ने भी ईश्वर से नहीं डरने का हिम्मत जुटाया ।
और , अभी का मौजूदा हाल यह है कि कोई भी ईश्वर से नहीं डरता।
हाँ, लोग-बाग थोड़ा सा , बहुत थोड़ा सा , जैसे, करोड़ के लिए दो - चार हजार दे कर अपना काम निकलवाने ईश्वर की शरण में जाने की चतुराई जरुर करने लगे हैं।
खैर! ईश्वर सबका भला करें।
फिर भी , ईश्वर यदि जीवित होते तो कहीं कोई ईमानदारी दिख जाती, जो दीखता नहीं - इसलिए हे प्रभु! तुम्हारे जीवित होने की आस रही नहीं।

बुधवार, 15 जुलाई 2009

निष्काम कर्म और सकाम कर्म

काफी पहले की बात है, मेरे किसी मित्र ने पूछा कोई ऐसा रास्ता बताओ जिससे दुःख न हो।
मैं पहले काफी घबराया कि क्या बेतुका सवाल है। फ़िर मैंने पूछा कि सुख चाहते हो या दुःख से छुटकारा ? मित्र ने दुःख से छुटकारा ।
मैंने कहा निष्काम कर्म कर्म करो। दुःख बिल्कुल न होगा।
निष्काम कर्म मतलब?
कर्म करो क्योंकि कर्म करना ही पड़ता है। लेकिन नतीजा से संचालित होकर कर्म करोगे तो दो स्थितयां होंगी- या तो मनोनुकूल परिणाम आएगा या नही आएगा । आया तो खुशी होगी और न आया तो दुःख ।
ये तय है कि कर्म अपने परिणाम को स्वयं निर्धारित करता है यानि कर्म के बराबर ही परिणाम होता है। तो पूछोगे निष्काम कर्म की क्या जरुरत?
जरुरत है अटैचमेंट कम करने की ।
किसी भी काम को एक काम जानो- नतीजा पैदा करने का जरिया न मानो।
वह उलझ गया
मैंने कहा - कर्म दो तरह के होते है- एक , जो हम भौतिक परिवर्तन के उद्देश्य से करते है , जैसे , दूध से दही बनने का उपक्रम या जो भी इस तरह के काम है। और दूसरा है- जो हम किसी मानव-व्यक्ति को प्रभावित करने के उद्देश्य से करते है , जैसे प्रेम या चापलूसी या चुगलखोरी । हम इस तरह के कर्म एक निश्चित उद्देश्य को लेकर ही करते हैं तथा इस तरह के कार्यों में असफल होने के खतरे बहुत अधिक होते हैं।
यह दूसरे तरह के कार्य ही है - सकाम कर्म , जो इन कार्यों से बचा हुआ है उसे न्यूनतम दुःख होता है।
जैसे आपने बहुत मेहनत करके खाना बनाया- भोजन तैयार भी हो गया आप बैठे हैं खानेवाले खाने की तारीफ करेंगे = बस यहीं आप गलती कर रहे हैं। खाना बनाना आपके वश में था और आप तारीफ सुनना चाहते हैं
या आप किसी का काम ख़राब करवाकर उसकी बेइज्जती करवाना चाहते हैं = यहाँ आप सकाम कर्म की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं ।
संक्षेप में , कर्म के अनिवार्य परिणाम से रत्ती भर अधिक की आकांक्षा सकाम कर्म है ।
एक उदहारण और लेते है।
कोई पुरूष है - वह किसी स्त्री की खूब देखभाल या आगे-पीछे करता है। वह पुरूष उस स्त्री से प्रेम की उम्मीद करता है जो पूरी नहीं हो पाती । वह पुरूष दुखी हो जाता है । अब इस दुःख का क्या मतलब है ?

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

नैतिकता बनाम कानून

नैतिकता क्या है?
हम क्यों चाहते हैं कि समाज में नैतिकता बनी रहे ?
हम अपने बच्चों को सही-ग़लत, उचित-अनुचित, अच्छे-बुरे की पहचान क्यो करवाते हैं?
छोडिये इन बातों को, सबसे पहले तो यह समझ लें सही और ग़लत में कुछ फर्क है भी या नहीं?
हमारा देश भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोक-तंत्र है। समानता , भाईचारा आदि महान मूल्यों को संविधान का आधार बिन्दु बनाया गया है। इसी समानता की दुहाई देकर कुछ माननीय न्यायाधीशों ने ' गे '(समलैंगिक मैथुन करने वालों ) को निरपराध की कोटि में रखा। एक कथित कुकृत्य को स्वतंत्रता का धरातल दिया। उन न्यायविदों ने उन घिनौने लोगों को एक समुदाय के रूप में देखा। फैसले का ख्याल किया जाय तो समलैंगिक मैथुन अब गैर-कानूनी नही।
अदालत को इस बात का भी संज्ञान लेना चाहिए कि हमारे-आपके समाज में और भी बहुत से कुकृत्य है जो बड़े पैमाने पर किया जा रहा है और उसपर सरकारें मुक़द्दमा भी चलाती है। बहुत संख्या को देख कर समता के सिद्धांत पर उन्हें भी निरपराध घोषित कर दिया जाना चाहिए ।
इस बकवास के पीछे मेरा यह कहना है कि नैतिकता को कानून से रौंदने की कवायद ठीक नही। विशेष कर गे - टाइप लोगों को , जो कि बहुधा लिजलिजे से , घिनौने से प्रतीत होते हैं , यह व्यवस्था देकर 'सोशल मोरल ' रौंदने की कानूनी कोशिश है। नैतिकता से बलात्कार करने का षडयंत्र है।

शनिवार, 30 मई 2009

ऊधो! मन न होहि दस-बीस

प्रेम हो या पूजा = इवादत हो कि मुहब्बत - ज़रूरी है अप्रतिहत निष्ठां , एक यकीनी अहसास।
कोई भक्त अपने ईश्वर या आराध्य के प्रति तभी आराधना करे जब वह उसकी शुभता, शक्तिमत्ता और अनुग्रह-प्रियता पर एकनिष्ठता से विश्वास करता हो।
भक्ति आपकी च्वाइस है- किसी ने आपको विवश नहीं किया कि आप भक्ति करें। और फिर यदि आपने भक्ति को चुना तो निर्विकल्पक रूप से अपने प्रभु की आराधना करें।
उपनिषद् कहती है - क्षुरस्य धार इव निशिता दुरत्यया। यानि यह तेज छुरे की धार पर चलने जैसा दुष्कर कार्य है।
यो बारी है प्रेम की खाला का घर नाहिं।
सीस उतारो भूइं धरो फिर पैठो घर माहि। ।
यदि आपका अंहकार शेष है, यदि आपका इगो बचा हुआ है कि मैं भी कुछ हूँ तो पूजा अर्चना व्यर्थ है। यह अंहकार ही आप और आपके प्रभु के बीच की अभेद्य दीवार है।
किंतु यदि आपने अपने सर्वस्व का अपने आराध्य के प्रति समर्पण कर दिया तो दूसरी भावना आप तक फटक ही नही सकती। आजमाया हुआ है, आप चाहें तो आजमा लें ।
रहिमन भरी सराय लखि, पथिक आपु फिरि जाय।
यही हुआ था ज्ञानी-ध्यानी ऊधव कृष्ण की दीवानी गोपियों को समझाने गए कि अब कान्हा की आस छोडो -कुछ पर-ब्रह्म के निर्गुण रूप की आराधना करो। गोपियों ने उद्धव का बड़ा मान किया , सम्मान किया क्योकि वे ब्रह्म-ज्ञानी थे, शास्त्र-वेत्ता थे। साथ ही अपनी विवशता बतलाई कि हमारे पास एक-एक ही मन है जो कान्हा में तल्लीन है। दूसरा मन कहाँ से लाऊँ, जिससे आपके बताये अनुसार आराधना करूँ। हमने कन्हैया को मन में बसा लिया है। हम विवश हैं , परवश हैं ।
इस बात को सुन उद्धवजी को भक्ति का सार समझ में आया । गोपियों को तनिक भी संदेह होता तभी उस संदेह छिद्र से उद्धव का ज्ञान गोपियों के हृदय तक पहुँच पाता।
जहाँ संदेह है वहां पूजा हो अथवा प्रेम - कुछ सफल नही हो सकता।
आप प्रेम करते हुए किसी की परीक्षा नही कर सकते तो भक्ति करते अपने आराध्य पर किंचित भी अविश्वास नही कर सकते।
आप ने असफल प्रेम की कहानियाँ अवश्य सुनी होंगी - वहां यकीन का मजबूत अहसास नही होता होगा।
भक्ति हो या प्रेम इसे समझौते या एग्रीमेंट की तरह नहीं समझ सकते।
और जो ऐसा समझते हैं उनका जो भी हश्र होता है आपको विदित ही होगा।
आप की असहमति की व्यग्र प्रतीक्षा में,
आप सबका ।

मंगलवार, 26 मई 2009

'अहम् ब्रह्म अस्मि' का तात्पर्य

अहम् ब्रह्मास्मि का सरल हिन्दी अनुवाद है कि मैं ब्रह्म हूँ । सुनकर बहुधा लोग ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाया करते हैं। इसका कारण यह है लोग - जड़ बुद्धि व्याख्याकारों के कहे को अपनाते है। किसी भी अभिकथन के अभिप्राय को जानने के लिए आवश्यक है कि उसके पूर्वपक्ष को समझा जाय।
उपनिषद् अथवा इसके एक मात्र प्रमाणिक भाष्यकार आदिशंकराचार्य किसी व्यक्ति-मन में किसी भी तरह का अंध-विश्वास अथवा विभ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहते थे।
इस अभिकथन के दो स्पष्ट पूर्व-पक्ष हैं-
१) वह धारणा जो व्यक्ति को धर्म का आश्रित बनाती है। जैसे, एक मनुष्य क्या कर सकता है करने वाला तो कोई और ही है। मीमांसा दर्शन का कर्मकांड-वादी समझ , जिसके अनुसार फल देवता देते हैं, कर्मकांड की प्राविधि ही सब कुछ है । वह दर्शन व्यक्ति सत्ता को तुच्छ और गौण करता है- देवता, मन्त्र और धर्म को श्रेष्ठ बताता है। एक मानव - व्यक्ति के पास पराश्रित और हताश होने के आलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। धर्म में पौरोहित्य के वर्चस्व तथा कर्मकांड की 'अर्थ-हीन' दुरुहता को यह अभिकथन चुनौती देता है।
२) सांख्य-दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति (जीव) स्वयं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी करती है -प्रकृति करती है। बंधन में भी पुरूष को प्रकृति डालती है तो मुक्त भी पुरूष को प्रकृति करती है। यानि पुरूष सिर्फ़ प्रकृति के इशारे पर नाचता है। इस विचारधारा के अनुसार तो मानव-व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व है ही नहीं।
इन दो मानव-व्यक्ति-सत्ता विरोधी धारणाओं का खंडन और निषेध करते हुए शंकराचार्य मानव-व्यक्तित्व की गरिमा की स्थापना करते हैं। आइये, समझे कि अहम् ब्रह्मास्मि का वास्तविक तात्पर्य क्या है?
अहम् = मैं , स्वयं का अभिमान , कोई व्यक्ति यह सोच ही नहीं सकता कि वह नहीं है। मैं नही हूँ - यह सोचने के लिए भी स्वयं के अभिमान की आवश्यकता होती है। या नहीं ? विचार करें ।
ब्रह्म= सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ , सर्व-व्याप्त , वह शक्ति जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं।
अस्मि= हूँ, होने का भाव , बने होने का संकल्प ।
सबसे पहले तो सभी मनुष्य को यह दृढ़ता से महसूस करना चाहिए कि वह है । अपने को किसी दृष्टि से , किसी भी कारण से, किसी के भी कहने से अपने को हीन, तुच्छ, अकिंचन आदि कतई नहीं मानना चाहिए। यह एक तरह का आत्म-घात है, अपने अस्तित्व के प्रति द्रोह है। कोई यदि आपको यह विश्वास दिलाने का यत्न करे कि आप तुच्छ हैं तो आप उस बात को पागल को प्रलाप समझ कर नज़र-अंदाज़ कर जाएँ।
दूसरी बात यह कि आप में, यानि हर व्यक्ति में सबकुछ= कुछ भी कर सकने की शक्ति विद्यमान है। ब्रह्म कहे जाने का अभिप्राय यही है कि प्रत्येक व्यक्ति में संभावन एक-सा है । कोई वहां उस गद्दी पर बैठ कर जो आपको ईश्वर प्राप्ति का रास्ता बता रहा है, वह स्वयं दिग्भ्रमित है और आपको मुर्ख बनने का प्रयास कर रहा है। आप स्वयं सर्व-शक्तिमान ब्रह्म हैं, इस सत्य का आत्मानुभव बड़ा है। उपनिषद और शंकराचार्य हमें यही विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।
अंत में ,
अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निगमित होता है कि मानव-व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों !
अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। कोई ईश्वर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्तियों को अनावश्यक महत्त्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो -उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो , उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ ।
जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा-उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।